देहरादून, 6 जून। आपके पास बंदूक भी हो और गोली भी, लेकिन इसे चलाने वाले सिपाही ही न हों तो क्या जंग जीती जा सकती है। एक ऐसा ही सवाल उत्तराखंड के हेल्थकेयर सिस्टम के सामने मुंह बाए खड़ा है। ऑपरेशन थिएटर हैं, सर्जिकल उपकरण हैं, लेकिन ऑपरेशन को अंजाम देने वाले कुशल और काबिल हाथ नहीं हैं। अब जबकि, कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर से निपटने के लिए राज्य रणनीति तैयार कर रहा है, तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बड़ा सवाल बन गई है। उत्तराखंड में जमीनी हकीकत बयान की जाए तो विशेषज्ञ डॉक्टरों के जितने पद हैं, उसके मुकाबले मात्र 40 फीसदी ही तैनात हैं। ऐसे में, कोविड की तीसरी लहर से निपट पाना एक बड़ी चुनौती दिख रहा है।
उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं हमेशा ही सवालों के घेरे में रही हैं। गर्भवती महिला की मौत, सड़क पर प्रसव जैसी खबरें सुर्खियां बनती रही हैं। कैग की ताजा रिपोर्ट में भी उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर पेश की गई। इस बीच, कोविड संक्रमण ने उत्तराखंड में जो कहर बरपाया, उससे स्वास्थ्य ढांचे की सारी परतें खुल गईं। हालांकि कोरोना काल में हेल्थ के बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन डॉक्टरों की उपलब्धता अब भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। स्पेशलिस्टों का तो भारी टोटा है।
हालात ये हैं कि स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के करीब 58 फीसदी पद खाली पडे हैं। कुल मिलाकर उत्तराखंड में स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स के 1187 पदों के विपरीत 492 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। हाल में मेडिकल चयन बोर्ड से 375 डॉक्टर राज्य को मिले, लेकिन इनमें से भी 100 से ज्यादा डॉक्टरों ने जॉइन ही नहीं किया।

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