गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर परमार्थ निकेतन में श्रीराम भक्ति, मानस वाचन एवं आध्यात्मिक चिंतन का आयोजन
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रामचरितमानस, मानवता को मर्यादा, करुणा और ईश्वर से जोड़ने वाला जीवन-दर्शन है” — स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 19 अगस्त। गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत वातावरण रहा।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने गोस्वामी तुलसीदास जयंती की मंगलकामनाएँ देते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने अपनी अमृतमयी वाणी से श्रीराम को राजमहलों से निकालकर जन-जन के हृदय तक पहुँचाया। उन्होंने संस्कृत के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को लोकभाषा में प्रस्तुत कर भक्ति को प्रत्येक व्यक्ति का सहज अधिकार बना दिया।
पूज्य स्वामी जी ने कहा, “रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को राममय बनाने का पवित्र पथ है। इसमें मर्यादा है, करुणा है, सेवा है, समरसता है और मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाने का संपूर्ण दर्शन समाहित है। यदि हम मानस को केवल पढ़ने के स्थान पर जीना प्रारम्भ कर दें, तो परिवार, समाज और राष्ट्र—तीनों में शांति और सद्भाव का विस्तार होगा।”
उन्होंने कहा कि आज का युग बाहरी प्रगति का युग अवश्य है, किंतु आंतरिक शांति की खोज पहले से अधिक आवश्यक हो गई है। ऐसे समय में तुलसीदास जी की वाणी हमें स्मरण कराती है कि सच्चा विकास केवल तकनीक से नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और चरित्र से होता है। श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, कर्तव्य और लोकमंगल का आदर्श है तथा तुलसीदास जी ने उसी आदर्श को सरल भाषा में जनमानस के जीवन का आधार बना दिया।
रामचरितमानस की प्रत्येक चौपाई केवल काव्य नहीं, बल्कि आत्मजागरण का मंत्र है। मानस हमें संदेश देती है कि भक्ति पलायन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दायित्व को ईश्वरार्पण भाव से निभाने की साधना है। परिवार में प्रेम, समाज में सम्मान, प्रकृति के प्रति करुणा और राष्ट्र के प्रति समर्पण—ये सभी मूल्य मानस के मूल संदेश हैं।
उन्होंने आगे कहा कि तुलसीदास जी का साहित्य भारतीय संस्कृति की आत्मा है। रामचरितमानस ने सदियों से करोड़ों लोगों को विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, आशा और विश्वास प्रदान किया है। यह ग्रंथ केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए नैतिक एवं आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत है।
श्रीराम जी हमारे जीवन के पाथेय बनें और गोस्वामी तुलसीदास जी की रामभक्ति हमारे अंतर्मन का प्रकाश बने।
