विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर परमार्थ निकेतन में किया पौधारोपण*
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने लिया प्रकृति संरक्षण का संकल्प*
वृक्ष, पृथ्वी का हरित आभूषण नहीं, वृक्ष, मानव चेतना की श्वास हैं*
प्रकृति बचेगी, तभी मानवता बचेगी
स्वामी चिदानन्द सरस्वती*
ऋषिकेश, 29 जुलाई। विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, संरक्षण और सह-अस्तित्व का अद्भुत संदेश देते हुए पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने पौधारोपण किया तथा प्रकृति की रक्षा का सामूहिक संकल्प लिया। यह सनातन दृष्टि का पुनर्स्मरण है, जो सम्पूर्ण सृष्टि को एक परिवार वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश देती है। वैदिक मंत्रोच्चार, हरित संकल्प और प्रकृति के प्रति श्रद्धा के साथ पौधा रोपण किया। 
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि प्रकृति संरक्षण तो सनातन संस्कृति में जीवन जीने की पद्धति है। भारतीय दर्शन ने हजारों वर्षों पूर्व ही यह उद्घोष किया कि पृथ्वी हमारी संपत्ति नहीं, हमारी माता है। जब हम प्रकृति को केवल संसाधन मानते हैं, तब शोषण प्रारम्भ होता है; और जब हम उसे माता मानते हैं, तब संरक्षण स्वतः जीवन का संस्कार बन जाता है।
उन्होंने कहा कि आज विश्व जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, सूखती नदियों, घटते वन क्षेत्रों और जैव-विविधता के संकट का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों का समाधान केवल आधुनिक तकनीकों से नहीं, बल्कि मानवीय चेतना में परिवर्तन से सम्भव है। पृथ्वी को बचाने का सबसे बड़ा उपाय है, अपने जीवन को प्रकृति के अनुकूल बनाना, आवश्यकता और लालसा के बीच का अंतर समझना तथा उपभोग नहीं, सहयोग की संस्कृति अपनाना।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में वृक्षों की पूजा पर्यावरणीय चेतना का दिव्य विज्ञान है। पीपल, वट, नीम, तुलसी, बेल, आंवला और अन्य पवित्र वृक्षों को पूजनीय मानने के पीछे यही संदेश है कि जिनसे जीवन चलता है, उनका संरक्षण भी हमारा धर्म बने। हमारे ऋषियों ने प्रकृति को देवत्व प्रदान किया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसका दोहन नहीं, वंदन करें।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आज आवश्यकता केवल अधिक वृक्ष लगाने की नहीं, बल्कि वृक्षों से संबंध जोड़ने की है। जब तक वृक्ष हमारे जीवन का भावनात्मक हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण केवल योजनाओं और अभियानों तक सीमित रहेगा। प्रत्येक परिवार यदि अपने जीवन में कम से कम एक वृक्ष को परिवार के सदस्य की तरह अपनाकर उसका पालन करे, तो यह धरती पुनः हरित, स्वस्थ और संतुलित बन सकती है। हमें याद रखना होगा की हरियाली है तो खुशहाली है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि आने वाला समय केवल तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय उत्तरदायित्व से पहचाना जाएगा। यदि युवा पीढ़ी प्रकृति के साथ अपना संबंध पुनः स्थापित कर ले, तो भविष्य अधिक सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध होगा।
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर पूज्य स्वामी जी ने प्रकृति के साथ पुनः प्रेम, विश्वास और आध्यात्मिक एकत्व स्थापित करने का आह्वान करते हुये कहा कि प्रकृति संरक्षण आज विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्यता है। पृथ्वी, जल, वायु, वन और जैव-विविधता का संरक्षण ही जीवन की सुरक्षा है। जब हम प्रकृति की रक्षा करते हैं, तब वास्तव में अपने वर्तमान, भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को Ji सुरक्षित करते हैं।