पूज्य सुधांशु जी महाराज का परमार्थ निकेतन में आगमन*
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी से दिव्य भेंट वार्ता*
परमार्थ गंगा तट पर संत चेतना का दिव्य संगम*
अदम्य साहस, अद्वितीय शौर्य और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की अमर प्रतीक वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर परमार्थ निकेतन से उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित कर आज की गंगा आरती की समर्पित*
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का सनातन संस्कृति के वैश्विक विस्तार में अभुतपूर्व योगदान*
सुधांशु जी महाराज*
ऋषिकेश, 19 जून। हिमालय की गोद में, माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन आज ऐसे आध्यात्मिक संगम का साक्षी बना, जहाँ संतों के दर्शन, स्नेहिल संवाद के साथ दिव्य चेतनाओं का संगम हुआ।
पूज्य सुधांशु जी महाराज विशेष रूप से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी को उनके पावन जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलाशीष अर्पित करने हेतु स्वयं पधारें।

परमार्थ निकेतन में पूज्य सुधांशु जी महाराज का आत्मीय अभिनन्दन परमार्थ गुरूकुल के आचार्यों व ऋषिकुमारों ने वेद मंत्रों, पुष्प वर्षा और शंख ध्वनि से किया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी की पूज्य संत सुधांशु जी महाराज से दिव्य भेंट हुई। यह भारतीय संत परम्परा की उस अमर धारा का सजीव दर्शन है जो पूज्य संतों के माध्यम से मानवता का उत्थान, संस्कृति का संरक्षण और विश्व में शांति के विस्तार हेतु प्रवाहित हो रही है।
इस दिव्य अवसर पर पूज्य संतों ने संदेश दिया कि आज का युग सूचना का युग है। तकनीक ने संसार को जोड़ दिया है, किन्तु हृदयों को जोड़ने का कार्य केवल अध्यात्म ही कर सकता है। यदि हम अपने भीतर के मौन से जुड़ जाए, तो समाज में संवाद, परिवार में विश्वास और विश्व में शांति स्वतः स्थापित हो सकती है।
भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक विरासत में निहित है। यह वह भूमि है जहाँ विजय का अर्थ किसी पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार पर विजय प्राप्त करना है। यही भारतीय संस्कृति का वैश्विक संदेश है और यही वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
पूज्य संतों ने कहा कि आने वाला भारत केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक चेतना से विश्व का नेतृत्व करेगा। युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ते हुए आधुनिकता को अपनाना होगा, क्योंकि वही विकास सार्थक है जिसमें मूल्य, मर्यादा और मानवीय संवेदनाएँ सुरक्षित रहें।

पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व पर भी गंभीर विचार-विमर्श हुआ। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि पृथ्वी केवल संसाधन नहीं, हमारी साझा विरासत है। प्रकृति की रक्षा किसी अभियान का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का दैनिक आध्यात्मिक कर्तव्य है। इस अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने यमुना स्वच्छता व तटों पर दोनों ओर पौधा रोपण के विषय में भी विस्तृत चर्चा की।
पूज्य सुधांशु जी महाराज ने परमार्थ निकेतन में प्रवाहित सेवा, साधना और संस्कार की धारा की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आध्यात्मिक केंद्र मानवता के लिए प्रेरणा-स्थल हैं, जहाँ व्यक्ति स्वयं को पहचानने के साथ-साथ समाज और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को भी समझता है।

उन्होंने कहा, मैं पूरे सनातन समाज की ओर से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने आया हूँ। आपका बहुत बड़ा उपकार हम सब पर है। आपने हमें दिशा प्रदान की है, आदर्श दिए हैं, संदेश दिए हैं, उपदेश दिए हैं। आपने हम सब को जीवन जीकर दिखाया है। आप प्रकृति से प्रेम करने वाले दिव्य व्यक्तित्व हैं।
पूज्य स्वामीजी ने सुधांशु जी महाराज को हिमालय की दिव्य भेंट रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।