आत्मोत्थान की पुकार और संतत्व की दिशा: शताब्दी समारोह में गूंजा युगऋषि का संदेश

हरिद्वार।शताब्दी समारोह के सायंकालीन सत्र में आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और आत्मोत्थान के सूत्रों से ओतप्रोत विचारों की त्रिवेणी प्रवाहित हुई। इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन और कृतित्व भारतीय संस्कृति की आत्मा को जाग्रत करने वाला है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव ने व्यक्ति निर्माण को ही राष्ट्र निर्माण का आधार माना और यही दृष्टि आज के वैश्विक परिदृश्य में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। शताब्दी समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के नवजागरण का उत्सव है।

इससे पूर्व शताब्दी समारोह के दलनायक डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि विश्व का भविष्य भारतीय संस्कृति में निहित है और भारतीय संस्कृति का भविष्य गायत्री परिवार के जीवन सूत्रों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार का विस्तार किसी संगठनात्मक रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति और साधना की तपश्चर्या का प्रतिफल है। गायत्री परिवार मत्स्यावतार की भांति निरंतर विस्तार कर रहा है, कभी आंवलखेड़ा से आरंभ हुई यह युगचेतना आज विश्व के अस्सी से अधिक देशों में मानवता को प्रकाश प्रदान कर रही है। उन्होंने भावविभोर स्वर में कहा। भारत सरकार के केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दुर्गा प्रसाद उइके ने कहा कि मनुष्य जीवन में संतत्व की यात्रा किसी बाह्य प्रदर्शन से नहीं, बल्कि अंतःकरण में उठने वाली वेदना और संवेदना के जागरण से प्रारंभ होती है। उन्होंने कहा कि युगऋषि पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित पंचतत्व-उपासना, साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन को गढ़ने वाले सुदृढ़ आधार स्तंभ हैं। जब इन्हें व्यवहार में उतारा जाता है, तभी व्यक्तित्व का समग्र, संतुलित और दिव्य विकास संभव हो पाता है। इस दौरान दिव्य सेवा प्र्रेम मिशन के आशीष गौतम सहित अनेक गणमान्यों ने अपने विचार प्रकट किये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *