शताब्दी समारोह में संतों व विशेषज्ञों का पर्यावरण संरक्षण पर मंथन
गायत्री परिवार में है अकूत वैचारिक क्षमता: स्वामी अवधेशानंद
शांतिकुंज संस्था नहीं, युग-प्रवर्तक धारा: स्वामी रामदेव
पर्यावरण संकट आत्मचिंतन की पुकारद: डॉ. चिन्मय पंड्या
हरिद्वार।नवयुग के निर्माण के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ सद्ज्ञान का समन्वय अनिवार्य है। इसी भावभूमि पर शांतिकुंज में आयोजित शताब्दी समारोह के अंतर्गत संतों, योगाचार्यों और विशेषज्ञों ने पर्यावरण संरक्षण व शुद्धि पर गहन विचार-मंथन किया।
इस अवसर पर जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि जिस समाज में एक कन्या को दस पुत्रों के समान माना गया है, वहाँ एक वृक्ष का महत्व दस कन्याओं से भी अधिक है, क्योंकि वृक्ष केवल एक जीवन नहीं, बल्कि समूची धरती की श्वास को जीवित रखते हैं। उन्होंने कहा कि जिन सभ्यताओं ने कभी वृक्षों को देवता, नदियों को माँ और पर्वतों को गुरु माना, आज वही प्रकृति के कोप का दंश झेल रही हैं। अंधाधुंध उपभोग और प्रकृति से दूरी ने पर्यावरण संतुलन को गहरी चोट पहुँचाई है। स्वामी जी ने प्लास्टिक के पूर्ण त्याग और वृक्षारोपण को जीवन-संस्कार बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि विवाह-वर्षगांठ, जन्मदिवस और मांगलिक अवसरों को हरित-संकल्प से जोड़ा जाए। उन्होंने कहाकृ“वृक्षों की ओर लौटें, प्रकृति की गोद में लौटें, वहीं जीवन सुरक्षित है।”
पतंजलि योगपीठ के संस्थापक योगऋषि स्वामी रामदेव जी ने कहा कि गायत्री परिवार कोई सामान्य संगठन नहीं, बल्कि महाशिव वेद तीर्थ और सनातन चेतना का जीवंत केंद्र है। न्यूनतम संसाधनों में इतनी व्यापक और सशक्त रचना खड़ी कर देना शांतिकुंज की अद्भुत साधना और दृष्टि का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि गायत्री एक सनातन, शाश्वत और अविराम प्रवाह है, जो साधक के चिंतन, चरित्र और कर्म को रूपांतरित करता है। शांतिकुंज उन्हें संस्था नहीं, बल्कि युग को दिशा देने वाली चेतना के रूप में दिखाई देता है। स्वामी रामदेव जी ने बताया कि पतंजलि योगपीठ के शोध संस्थानों की प्रेरणा उन्हें परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान से मिली। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के साधक केवल गायत्री का गायन नहीं करते, बल्कि उसे जीते हैं।
शताब्दी समारोह के दलनायक डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने पर्यावरण संकट पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज प्रदूषण से होने वाली असमय मृत्यु युद्ध और आतंकवाद से भी अधिक हो चुकी है। मानव की साँसें या तो दुर्लभ होती जा रही हैं या विषैली बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि अंतःकरण की विकृति का प्रभाव पर्यावरण पर अवश्य पड़ता है। यह संकट मानव की 360 डिग्री जिम्मेदारी है, जो प्रकृति, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक विस्तृत है। उन्होंने हजारों स्वयंसेवकों को संकल्प दिलाया कि देश के प्रत्येक जिले में परम वंदनीया माताजी के नाम से उपवन स्थापित किए जाएंगे, तीर्थों का शुद्धिकरण होगा और नदियों, विशेषकर गंगा माँ के संरक्षण को जन-आंदोलन बनाया जाएगा।
इस अवसर पर अतिथियों ने आंवला सहित विभिन्न पौधों का पूजन किया गया, जिन्हें देश-विदेश से आए स्वयंसेवकों में वितरित किया जाएगा। कार्यक्रम में पीआईबी (पूर्व क्षेत्र) के प्रधान महानिदेशक श्री भूपेंद्र कैंथोला, भारतीय नदी परिषद के संस्थापक श्री रमणकांत, मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री मनु गौड़, सूरतगिरि बंगला के अध्यक्ष स्वामी विश्वेश्वरानंद जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक के वरिष्ठ पदाधिकारी श्री गोपाल आर्य, श्री किशोर उपाध्याय स्थानीय विधायक श्री मदन कौशिक सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
